हाँ, भारत में लिव-इन पार्टनर के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामले दर्ज किए जा सकते हैं।
यह 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत आता है, जो सुरक्षा को केवल कानूनी तौर पर शादीशुदा महिलाओं तक ही सीमित नहीं रखता है।
मुख्य कानूनी अवधारणा
यह कानून उन महिलाओं को सुरक्षा देता है जो "शादी जैसी प्रकृति वाले रिश्ते" (यानी, लिव-इन रिश्ते जो शादी जैसे लगते हैं) में हैं।
लिव-इन रिश्ता कब योग्य माना जाता है?
अदालतों (भारत के सुप्रीम कोर्ट सहित) ने यह स्पष्ट किया है कि हर लिव-इन रिश्ता इस कानून के दायरे में नहीं आता है। इसमें आम तौर पर ये बातें शामिल होनी चाहिए:
एक स्थिर, लंबे समय तक चलने वाला रिश्ता
एक ही घर में साथ रहना
एक जोड़े के रूप में सामाजिक पहचान (कुछ हद तक)
सिर्फ़ एक कैज़ुअल या कम समय का रिश्ता न होना
क्या सुरक्षा उपलब्ध है?
ऐसे रिश्ते में रहने वाली महिला ये चीज़ें मांग सकती है:
सुरक्षा आदेश (दुर्व्यवहार रोकने के लिए)
रहने का अधिकार (साझा घर में रहने का अधिकार)
आर्थिक सहायता/भरण-पोषण
मानसिक या शारीरिक नुकसान के लिए मुआवज़ा
महत्वपूर्ण बिंदु
कैज़ुअल रिश्ते, या पूरी तरह से आर्थिक या अस्थायी व्यवस्थाओं पर आधारित रिश्ते, इस अधिनियम के तहत सुरक्षा के लिए योग्य नहीं माने जा सकते हैं।
हाँ, एक महिला भारतीय घरेलू हिंसा कानून के तहत कस्टडी (अभिरक्षा) से जुड़ी राहत पा सकती है, और इस राहत का दायरा काफी बड़ा है, हालाँकि यह मुख्य रूप से अस्थायी प्रकृति की होती है।
'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत, एक मजिस्ट्रेट को बच्चों की कस्टडी से जुड़े आदेश पारित करने का अधिकार होता है, जब कोई महिला घरेलू हिंसा से सुरक्षा की मांग करते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाती है। इसमें बच्चों की अंतरिम कस्टडी माँ को सौंपना भी शामिल है, ताकि केस के चलने के दौरान माँ और बच्चे को किसी असुरक्षित या हिंसक माहौल में रहने के लिए मजबूर न होना पड़े। इस प्रावधान का उद्देश्य बच्चे के कल्याण को तुरंत सुनिश्चित करना और उनकी रहने की स्थितियों में किसी भी तरह के और नुकसान या बाधा को रोकना है।
अदालत दूसरे माता-पिता के बच्चे से मिलने के अधिकार को भी नियंत्रित या सीमित कर सकती है। उचित मामलों में, मजिस्ट्रेट 'विज़िटेशन राइट्स' (मिलने के अधिकार) की अनुमति दे सकता है; इसका मतलब है कि दूसरे माता-पिता को कुछ खास शर्तों, समय या किसी की देखरेख में बच्चे से मिलने की इजाज़त दी जा सकती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि अदालत किसे सुरक्षित और उचित मानती है। यह सुनिश्चित करता है कि जहाँ एक तरफ बच्चे को नुकसान से बचाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ दोनों माता-पिता के साथ उसके भावनात्मक और पारिवारिक रिश्तों का भी ध्यान रखा जा रहा है।
हालाँकि, यह समझना बहुत ज़रूरी है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत दी गई कस्टडी केवल अंतरिम या अस्थायी कस्टडी होती है। यह अभिभावक अधिकारों का कोई अंतिम निर्णय नहीं होता है। बच्चे की अंतिम और स्थायी कस्टडी का फैसला सामान्य पारिवारिक और अभिभावक कानूनों के तहत किया जाता है, जैसे कि 'अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890' (Guardians and Wards Act, 1890), या पक्षों पर लागू होने वाले व्यक्तिगत कानूनों के तहत, जो कि केस की प्रकृति पर निर्भर करता है। ये कानूनी प्रक्रियाएँ अलग होती हैं और इनमें बच्चे के दीर्घकालिक कल्याण से जुड़े कारकों का ज़्यादा विस्तार से मूल्यांकन किया जाता है।
कस्टडी से जुड़े मामलों का फैसला करते समय, भारतीय अदालतें एक बहुत ही मज़बूत कानूनी सिद्धांत का पालन करती हैं: बच्चे का कल्याण ही सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। इसका मतलब है कि अदालत अपने आप किसी भी एक माता-पिता का पक्ष नहीं लेती है। इसके बजाय, वह बच्चे की उम्र, भावनात्मक जुड़ाव, सुरक्षा, माता-पिता की आर्थिक स्थिरता, पहले की देखभाल की व्यवस्थाएँ और कुल मिलाकर माहौल जैसे कारकों पर गौर करती है। यदि अदालत को लगता है कि बच्चे की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने के लिए माँ ज़्यादा बेहतर स्थिति में है—विशेष रूप से उन मामलों में जहाँ घरेलू हिंसा शामिल हो—तो आम तौर पर कस्टडी माँ को ही सौंपी जाती है, कम से कम अस्थायी आधार पर तो ज़रूर। कस्टडी के साथ-साथ, महिला को इसी कानून के तहत अन्य सुरक्षात्मक राहतें भी मिल सकती हैं, जैसे कि दुर्व्यवहार करने वाले के खिलाफ सुरक्षा आदेश, साझा घर में रहने का अधिकार या कोई वैकल्पिक आवास, और भरण-पोषण तथा बच्चे के खर्चों के लिए आर्थिक सहायता।
संक्षेप में, यह कानून मानता है कि घरेलू हिंसा की स्थितियों में, महिला और बच्चे दोनों की तत्काल सुरक्षा आवश्यक है। इसलिए, यह अदालतों को सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अस्थायी कस्टडी देने की अनुमति देता है, जबकि कस्टडी के अंतिम निर्णय अलग से और बच्चे के दीर्घकालिक कल्याण को ध्यान में रखते हुए लिए जाते हैं।